सूरए अहज़ाब की आयत क्रमांक 16 और 17 का अनुवादः
(हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि यदि तुम मृत्यु और मारे जाने से भागो भी तो यह भागना तुम्हारे लिए कभी भी लाभदायक न होगा। और (अगर लाभदायक हुआ तो) उस हालत में भी तुम कम ही सुख प्राप्त कर पाओगे। कह दीजिए कि यदि ईश्वर तुम्हारी कोई बुराई चाहे या वह तुम्हारे प्रति दया का इरादा करे तो कौन है जो तुम्हें ईश्वर से बचा सकता है (या जो उसकी दया को रोक सकता है)? तथ्य यह है कि वे ईश्वर के अतिरिक्त किसी को न अपना समर्थक पाएँगे और न सहायक।
संक्षिप्त टिप्पणी:
यह मत सोचो कि अगर तुम मारे जाने के भय से रणक्षेत्र से भाग जाओगे तो इससे तुम्हें कोई लाभ होगा क्योंकि तुम अधिक से अधिक कुछ और दिन इस संसार से लाभान्वित हो सकोगे लेकिन तुमने अनंत नरक अपने लिए ख़रीद लिया है और तुम ईश्वरीय कोप में ग्रस्त हो जाओगे।
इन आयतों से मिलने वाले पाठ:
- सभी को एक न एक दिन मरना है और कोई भी उससे बच नहीं सकता तो कितना बेहतर है कि मौत ईश्वर के मार्ग में और उसके आदेशों का पालन करते हुए आए।
- हमें अनंत कल्याण को नश्वर दुनिया और अस्थायी आनंदों के बदले नहीं बेचना चाहिए।. सृष्टि, ईश्वर की युक्ति और इच्छा के अंतर्गत है।
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1. सृष्टि, ईश्वर की युक्ति और इच्छा के अंतर्गत है।
- कटु व मधुर घटनाएं और विजय व पराजय सब कुछ ईश्वर की तत्वदर्शिता के आधार पर है। मनुष्य का कल्याण ईश्वर की शिक्षाओं और आदेशों के पालन के मार्ग में चलने पर निर्भर है।